Monday, 17 September 2012

आकांक्षा पारे की कवितायेँ



जबलपुर में जन्मी आकांक्षा उन कवयित्रियों में से हैं जो साधिकार स्त्री-विमर्श के पक्ष में खड़े होने का उद्गोष करती हैं!  उनकी कवितायेँ एक आम स्त्री से लेकर कामकाजी स्त्री के संघर्ष के सभी पहलुओं को समेटते हुए प्रश्नवाचक मुद्रा में आपके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं!  सरल और सहज शब्दों में वे अपनी बात आप तक पहुंचाती हैं, कहीं कभी नहीं लगता कि  कोई प्रयास या उपक्रम इसमें शामिल है !



परिचय :  जन्म जबलपुर (मध्यप्रदेश), शिक्षा : देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से पत्रकारिता, जीव-विज्ञानं  में स्नातक, सभी पत्र -पत्रिकाओं में कवितायेँ-कहानियां प्रकाशित, हिंदी आउटलुक से जुडाव!


कहानी पर ’रमाकांत स्मृति’ पुरस्कार (2011), अभी हाल ही में इलाहाबाद बैंक द्वारा इला-त्रिवेणी सम्मान 2012 से सम्मानित!


औरत के शरीर में लोहा


औरत लेती है लोहा हर रोज़
सड़क पर, बस में और हर जगह
पाए जाने वाले आशिकों से

उसका मन हो जाता है लोहे का
बचती  नहीं हैं संवेदनाएँ

बड़े शहर की भाग-दौड़ के बीच
लोहे के चने चबाने जैसा है
दफ़्तर और घर के बीच का संतुलन
कर जाती है वह यह भी आसानी से

जैसे लोहे पर चढ़ाई जाती है सान
उसी तरह वह भी हमेशा
चढ़ी रहती है हाल पर

इतना लोहा होने के बावजूद
एक नन्ही किलकारी
तोड़ देती है दम
उसकी गुनगुनी कोख में
क्योंकि
डॉक्टर कहते हैं
ख़ून में लोहे की कमी थी।

घर संभालती स्त्री

गुस्सा जब उबलने लगता है दिमाग में
प्रेशर कुकर चढ़ा देती हूँ गैस पर
भाप निकलने लगती है जब
एक तेज़ आवाज़ के साथ
ख़ुद-ब-ख़ुद शांत हो जाता है दिमाग
पलट कर जवाब देने की इच्छा पर
पीसने लगती हूँ, एकदम लाल मिर्च
पत्थर पर और रगड़ कर बना देती हूँ
स्वादिष्ट चटनी

जब कभी मन किया मैं भी मार सकूँ
किसी को
तब
धोती हूँ तौलिया, गिलाफ़ और मोटे भारी परदे
जो धुल सकते थे आसानी से वॉशिंग मशीन में
मेरे मुक्के पड़ते हैं उन पर
और वे हो जाते हैं
उजले, शफ़्फ़ाक सफ़ेद

बहुत बार मैंने पूरे बगीचे की मिट्टी को
कर दिया है खुरपी से उलट-पलट
गुड़ाई के नाम पर
जब भी मचा है घमासान मन में

सूती कपड़ों पर पानी छिड़क कर
जब करती हूं इस्त्री
तब पानी उड़ता है भाप बन कर
जैसे उड़ रही हो मेरी ही नाराज़गी
किसी जली हुई कड़ाही को रगड़ कर
घिसती रहती हूँ लगातार
चमका देती हूँ
और लगता है बच्चों को दे दिए हैं मैंने इतने ही उजले संस्कार

घर की झाड़ू-बुहारी में
पता नहीं कब मैं बुहार देती हूँ अपना भी वजूद
मेरे परिवार में, रिश्तेदारों में, पड़ोस में
जहाँ भी चाहें पूछ लीजिए
सभी मुझे कहते हैं
दक्ष गृहिणी।

बित्ते भर की चिंदी


पीले पड़ गए उन पन्नों पर
सब लिखा है बिलकुल वैसा ही
कागज़ की सलवटों के बीच
बस मिट गए हैं कुछ शब्द।

अस्पष्ट अक्षरों को
पढ़ सकती हूं बिना रूके आज भी
बित्ते भर की चिंदी में
समाई हुई हूँ मैं।

अनगढ़ लिखावट से
लिखी गई है एक अल्हड़ प्रणय-गाथा
उसमें मौज़ूद है
सांझे सपने, सांझा भय
झूले से भी लंबी प्रेम की पींगे

उसमें मौज़ूद है
मुट्ठी में दबे होने का गर्म अहसास
क्षण भर को खुली हथेली की ताजा साँस
फिर पसीजती हथेलियों में क़ैद होने की गुनगुनाहट

अर्से से पर्ची ने
देखी नहीं है धूप
न ले पाई है वह
चैन की नींद

कभी डायरी
तो कभी संदूकची में
छुपती रही है यहाँ-वहाँ
ताकि कोई देख न ले
और जान न जाए
चिरस्वयंवरा होने का राज।

रिश्ते


बिना आवाज़
टूटते हैं रिश्ते
या
उखड़ जाते हैं
जैसे
धरती का सीना फाड़े
मजबूती से खड़ा
कोई दरख़्त
आंधी से हार कर
छोड़ देता है अपनी जड़े!


टुकड़ों में भलाई


हर जगह मचा है शोरख़त्म हो गया है अच्छा आदमी
रोज़ आती हैं ख़बरें
अच्छे आदमी का साँचा
बेच दिया है ईश्वर ने कबाड़ी को


'अच्छे आदमी होते कहाँ हैं
का व्यंग्य मारने से 
चूकना नहीं चाहता कोई
एक दिन विलुप्त होते भले आदमी ने
खोजा उस कबाड़ी को
और 
मांग की उस साँचे की


कबाड़ी ने बताया 
साँचा टूट कर बिखर गया है
बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में
कभी-कभी उस भले आदमी को
दिख जाते हैं, वे टुकड़े
किसी बच्चे के रूप में जो
हाथ थामे बूढ़े का पार कराता है सड़क
भरी बस में गोद में बच्चा लिए
चढ़ी स्त्री के लिए सीट छोड़ता युवा
चौराहे पर भरे ट्रैफिक में 
मंदिर दिख जाने पर सिर नवाती लड़की
विलुप्त होता भला आदमी ख़ुश है
टुकड़ों में ही सही
ज़िन्दा है भलाई!



बदलती परिभाषा


बचपन में कहती थी माँ
प्यार नहीं होता हँसी-खेल
वह पनपता है दिल की गहराई में
रोंपे गए उस बीज से
जिस पर पड़ती है आत्मीयता की खाद
होता है विचारों का मेल।

साथ ही समझाती थी माँ
प्रेम नहीं होता गुनाह कभी
वह हो सकता है कभी भी
उसके लिए नहीं होते बंधन
न वह क़ैद है नियमों में


आज अचानक बदल रही है माँ
अपनी ही परिभाषा
उसके चेहरे पर उभर आया है भय
जैसे किया हो कोई अपराध उसने
अब समझाती है वह
परियों और राजकुमारियों के किस्सों में
पनपता है प्यार
या फिर रहता है क़िताबों के चिकने पन्नों पर


लेकिन एक दिन आएगा
जब तुम कर सकोगी प्यार, सच में
ज़माना बदल जाएगा
प्रेम का रेशमी अहसास
उतर आएगा, खुरदुरे यथार्थ पर
तब तक, बस तब तक
बन्द रखो अपनी आँखें
और समेट लो सुनहरे सपने।



प्रस्तुति :  अंजू शर्मा एवं यशवंत माथुर 

Wednesday, 12 September 2012

संध्या नवोदिता की लघु कविताएं


मित्रों अंजू जी की अस्वस्थता की वजह से इस ब्लॉग पर एक अल्प विराम रहा है। आज के अंक मे हम आपके लिये ले कर आए हैं संध्या नवोदिता जी की कुछ लघु कविताएं। 'देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर' की तरह ही संध्या जी की कविताएं अंतर्निहित संदेश को पाठक तक प्रेषित करने मे पूरी तरह सक्षम हैं।

यह एक सुखद संयोग है कि आज 12 सितंबर संध्या जी का जन्मदिन है। 'उड़ान अन्तर्मन की' और इसके सभी पाठकों की ओर से संध्या जी को हमारी हार्दिक शुभ कामनाएँ!



संध्या नवोदिता
जन्म : १२ सितम्बर १९७६. बरेली
एक संवेदनशील कवयित्री, कवि गोष्ठियों में निरंतर शिरकत, सहारा समय के लिए फीचर लेखों की लम्बी श्रृंखला!
'जिसे तुम देह से नहीं सुन सके' काव्य संग्रह प्रकाशाधीन
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ प्रकाशित
'HISTORY WILLABSOLVE ME' फिदेल कास्त्रो की किताब का हिंदी अनुवाद 'इतिहास मुझे बरी करेगा', फिदेल कास्त्रो के लेख Words to Intellectuals का हिंदी अनुवाद  'बुद्धिजीवियों से मुखातिब'






औरतें


कहाँ हैं औरतें?
जिंदगी को रेशा-रेशा उधेड़ती
वक़्त की चमकीली सलाइयों में
अपने ख्वाबों के फंदे डालती
घायल उँगलियों को तेज़ी से चला रही हैं औरतें

एक रात में समूचा युग पार करतीं
हांफती हैं हफ-हफ
लाल तारे से लेती हैं थोड़ी-सी ऊर्जा
फिर एक युग की यात्रा के लिए
तैयार हो रही हैं औरतें

अपने दुखों की मोटी नकाब को
तीखी निगाहों से भेदती
वे हैं कुलांचे मरने की फिराक में
ओह, सूर्य किरणों को पकड़ रही हैं औरतें


गलती वहीँ हुई थी


तुम्हारे अँधेरे मेरी ताक में हैं
और मेरे हिस्से के उजाले
तुम्हारी गिरफ़्त में

हाँ
गलती वहीँ हुई थी
जब मैंने कहा था
तुम मुझको चाँद ला के दो

और मेरे चाँद पर मालिकाना तुम्हारा हो गया


इन दिनों


एक जंगल-सा उग आया है
मेरे भीतर
इन दिनों

वहां रास्ते नहीं
पगडंडियाँ नहीं
कोई जाने-पहचाने निशान नहीं

कोई जल्दी नहीं
बेख़बर है यह दुनिया
समय की हलचलों से

चाँद उग आया है यहाँ
उल्टा होकर


सीख रही हूँ मैं


मैं सीख रही हूँ
शब्दों को सीधा रखना
तरतीबवार
अलगनी से उतार कर
सलीके से उनकी सलवटें निकालना
शब्दों को पहचानना उनकी परछाईं से
उनमें गुंजाइशें तराशना
सीख रही हूँ

दरअसल
शब्दों को छीला जाना है अभी
ताकि वे बने नागफनी-से नुकीले
और छूते ही टीस भर दें 


प्रस्तुति--यशवन्त माथुर 
सहयोग-अंजू शर्मा 

Tuesday, 7 August 2012

अरुणाकर पाण्डेय की कविताएं



दिल्ली विश्वविद्यालय मोती लाल नेहरू कॉलेज में हिन्दी के अध्यापक युवा रचनाकार अरुणाकर पाण्डेय की कविताएं एवं आलोचनाएँ  विभिन्न पत्रिकाओं मे समय समय पर प्रकाशित होती रहती हैं। साहित्यिक परिवार का होने के कारण साहित्य एवं संस्कृति से इनका सहज जुड़ाव है। जागरूक युवा पीढ़ी की व्यावहारिक कल्पना,संवेदना और नये बिम्बों का दर्शनीय प्रयोग इनकी कविताओं मे दिखाई देता है। 



तो लीजिये आज की पोस्ट में  प्रस्तुत हैं अरुणाकर की कुछ चुनिन्दा रचनाएँ--


अंतरण


खिड़की के शीशे पर सिर टिकाये
उदास आँखों से आसमान में खोजता चाँद-सितारे
चुपचाप वह रात की यात्रा करते हुए
स्वयं एक चौराहे पर लगी प्रतिमा जैसा बन जाता है

उन्हें ना पाकर भी वह इस उम्मीद में खड़ा रहने का फ़ैसला
करता है कि जब थककर गिरे तो नींद उसे अपने में विलीन कर लेगी
लेकिन ऐसा कुछ नहीं घटता क्योंकि नींद  
नदी और आकाश सरीखी नहीं रह गयी है
और ना ही आती है किसी बटन के दबाने से

ऐसे में उसे खिड़की से
दिखती है नीचे की काली और चौड़ी सुनसान सड़क
वह सड़क नृत्य करती हुयी है
और उसकी थिरकन में कोई वाहन नहीं आता
आते हैं बारी-बारी से चीखते-बिलखते शब्द
जिनके कोई अर्थ नहीं होते
उनकी लंबी कतार कहाँ से कहाँ तक की यात्रा करती है
यह केवल सड़क जानती है
वे सड़क के बीच के नए ऊँचे लैम्प पोस्टों को ऐसे पार करते हैं कि वे
नदी पर बने कई किलोमीटर लंबे किसी अमरीकी-यूरोपीय पुल को पार कर रहे हों
अर्थहीन शब्द अंतहीन पुलों को पार करते जाते हैं
और इस प्रक्रिया में खिड़की पर खड़े उस लड़के को
यह समझ आता है कि
नदी नींद से लापता सड़क हो गयी है
वह यह भी समझ पाता है कि रात को लैम्प-पोस्ट का प्रकाश जिनमें अर्थहीन शब्द चीखते हैं
और उसके बीतने के साथ जो उजाला आता है
एक नैसर्गिक भ्रम है

वह शहर बदलना चाहता है
लेकिन उसके घर की नीचे वाली लापता सड़क पर
रात बीतने के बावजूद
कोई वाहन मौजूद नहीं है

पेड़ का संगीत                                                                       

पेड़ की उम्र जानने के लिए
उसे काटना ज़रूरी है
ताकि उसके भीतर के वृत्तों को गिनकर
हम लगा सकें उसकी सटीक कीमत
शायद पेड़ यह नहीं जानते


मित्र के सिगरेट के धुएँ ने
जब छुआ मंडी हाउस के उस पेड़ को
तो वह नींद से जागकर
ढलती शाम का जायज़ा लेने लगा
सुनाई पड़ा उसका संगीत

उसमें छिपे थे
पिछले कई बरसों के
रंग, सुर, ताल, रेखाएँ , शब्द व दृश्य
कह चुका था वह ऐसी कहानी
जिसे सुना सकता है
केवल कोई बूढ़ा कैसेनोवा
बस चाहिए होता है कोई नया कलाकार

उस पेड़ का संगीत सुनने और ना सुनने के बीच
मानवता की अँधेरी गलियाँ रहती हैं
जिनमें खोई हुयी कला को समझ लेना
मुश्किल में डाल सकता है मित्र को
क्योंकि खून वहाँ रंग है
हड्डी वाद्ययंत्र
चीख शब्द
चीरे के निशान हैं रेखाएँ
और अँधेरा
स्वयं में सौंदर्य की संभावना लिए एक अंतहीन दृश्य


मरे हुए मनुष्य के
मन और शरीर में यदि भर दिया जाए
पेड़ का यह संगीत 
तो उसकी भाषाएँ खत्म हो जायेंगी
पेड़ यह अच्छी तरह जानता है
फिर भी मनुष्य को नहीं कलाकार को सुना पाता है अपना संगीत
कलाकार और मनुष्य के इस अंतर्विरोध में
पेड़ से बिलकुल अलग यह प्राकृतिक अन्याय है कि
दोनों को ही कटने पर कोई वृत्त नहीं मिलता

इससे पहले कि मैं मित्र से बाँट लूँ
पेड़ का यह संगीत
उसे ले जाता है  
शब्दों या चित्रों का सरल मोबाईल सन्देश
इतनी आगे कि
पेड़ छूट जाता है बहुत पीछे
शायद हम अब भी उसकी सही उम्र नहीं जान सकते 

प्रह्लाद और भोजन


हमेशा की तरह
ये पंक्तियाँ सहस्त्राब्दी के महानायक के लिए नहीं
क्योंकि इनमें वे अप्रस्तुत विधान की तरह मौजूद हैं
जो प्रस्तुत हो सकता है
वह प्रह्लाद है
बम्बई का वह टैक्सी ड्राइवर
जिसे पीटकर शायद हो गया है नवनिर्माण
लेकिन दिल्ली का एक छात्र
जो भोजन के लिए बैठा है आर्ट्स फैकल्टी कैंटीन में
असमंजसता का है शिकार
कि वह क्या खाए
पाव-भाजी बीस रूपये एक प्लेट  
चाउमीन बीस रूपये एक प्लेट
आलू-पूड़ी दस रूपये एक प्लेट
छोले या राजमा चावल भी दस रूपये प्लेट

महाराष्ट्र नवनिर्माण की दृष्टि से देखें तो
मराठी पाव–भाजी चीनी चाउमीन से बराबरी की
प्रतिस्पर्धा कर रहा है
उस कैंटीन में
और उत्तर भारतीय  व्यंजनों
की अस्मिता हो गयी है आधी
ठीक देश की राजधानी में

आप चाहे तो इसे जातीय चोट मानकर
कह सकते हैं कि
उत्तर भारतीय भोजन करने वालों की संख्या ज्यादा है
या फिर सोच सकते हैं कि इस भूल में नप सकते हैं
पराड़कर, अम्बेडकर, माओ, बुद्ध, कन्फ्यूशियस तथा और भी
बहुत से वे लोग
जो प्रह्लाद की रोटी बना सकते थे !!

टूटी-फूटी हड्डियाँ और टैक्सी लेकर
प्रह्लाद वोट देने नहीं जाएगा
उसकी लड़ाई लड़ रहे हैं
सहस्त्राब्दी के महानायक क्षेत्रीय नवनिर्माताओं से
कुछ साल पहले भी
बरसात से जलमग्न हुयी बम्बई में
शायद डूबे थे सभी उत्तर भारतीय ही
जब बकौल एक सांसद महानायक नहीं कर पाए थे स्नान

ऐसे में संवेदनशील छात्र
कुछ भी खाए
स्वाद एक ही आएगा

वो जो दिखती है



एक औरत के वजूद को
मैं देखता हूँ कि
बालकनी के आईने में
कई बार अपना चेहरा देखते हुए
वो अक्सर क्लिपों में टांगकर
कपड़ों को सुखाने के लिए फैलाती है
इस तरह क्लिप, कपड़े, आईने और चेहरे में
सदियों से तड़पता रिश्ता पढ़ लेता हूँ मैं

दुबारा ठीक उसी जगह देखने पर
कपड़े और औरत कहीं खो जाते हैं
दिखती है एक चिड़िया
जो बैठी है क्लिप की तार पर
इससे फिर पता लगता है कि
सूखे कपड़े और औरत के बीच रिश्ता गहनतम है
और यह भी कि क्लिप और चिड़िया
का संबंध अस्थिरता का है
क्योंकि क्लिप में चिड़िया नहीं कपड़े सूखते हैं

चिड़िया को आईना नहीं चाहिए
उसे बैठने के लिए चाहिए एक ठौर
जो उस जगह क्लिप है
चिड़िया को हम क्लिप में नहीं टांग सकते
लेकिन अक्स को आईने में टांग सकते हैं

सदियों पुराने इस रिश्ते में बच गयी है औरत
जो रोज़ क्लिप में कपड़े टांगने आती है
इस कविता में कोई और
नहीं रहता 

प्रस्तुति-यशवन्त माथुर 

सहयोग-अंजू शर्मा 

Sunday, 29 July 2012

शंभू यादव की कविताएँ

दोस्तों! आज हम आपके लिये लेकर आए हैं शंभू यादव जी की कुछ कविताएँ।

पेशे से व्यवसायी शंभू जी साहित्य एवं काव्य में गहरी रूचि रखते हैं। सहज एवं जिज्ञासु श्रोता शंभू जी की रचनाएँ  आम आदमी एवं समाज के निम्न वर्ग के प्रति उनकी सहानुभूति की स्वतः अभिव्यक्ति हैं जो शुरू से अंत तक पाठक को सफलता पूर्वक बांधे रखती हैं। 

बीरबानी

वह मुँह अंधेरे उठ गई है
तूड़े में बिनौले मिलाती
भैंसों को डाल रही है सानी
थाण से उठाती गोबर
दिन में उपले थापेगी

पौ फटे चक्की पीसती

वह बुहार रही है घर का कूड़ा
जमा करती है कूडी में खाद

धूप फैलने को है आंगन में
वह गोद वाले को चूच्ची पिलाती
खेल में मस्त छोरी पर झीकती है-
‘नासपीटी, कुछ पढ़ ले !’

वह फूंकती है चूल्हा
उपले-सरकंडों की चरड़-चरड़
रोटी की महक फैली है
वह नहा रही है
पीटने को पड़े हैं मैले लत्ते
वह घाघरा पहन रही
ऊपर कुर्ती
सिर पर गोटेवाली लुगड़ी
‘बस-बस ! हो गया सिंगार’
वह घूंघट निकाल रही

अपने धणी की रोटी लेकर आ गई है खेत में
छाय, गंठी के साथ मिस्सी रोटी खाता वह
वह देखती उसको
चरते बैलों को पपोलती

तेज धूप में लावणी करती

खाते में निकालती अनाज़
बांकली फांकती
वह गुड़-धाणी बांट रही

उसके सिर पर भारी भरौटा

चुपड़ दिया है सास का सिर
पड़ोस से आयी दादी के पांव भीचें
‘दूधो नहाओ पूतो फलो’

चाक की चकली घूम रही है लगातार
साठ हाथ उंडे कुएं से पानी खींचती वह
अभी तो डांगरों को भी जोहड़ ले जाना

अंधेरा घेरने लगा
उसने चिमनी जला दी
समेट लिया शाम का चौका
‘हारे में कड़ा-उपला डालना न भूलियो’
बचा रखनी है आग हरदम

टाबरों को थपेड़
वह काजल लगाती
भीतर वाले कोठे में लेटी है
मौटयार के बगल
चूड़ियों की खन-खन
वह सो जाना चाहती है दो घड़ी के लिए
वह सपना देखती

वह सोचती है-
‘उसके सिर ये गज भर का घूँघट क्यों ?’

पृथ्वी, मेरी माँ और भूकंप


सदियों से
पृथ्वी पर बसे हैं हम
मेरी माँ कहती है
पृथ्वी बसी है बैल के सींग पर

जब कभी भूकंप आता है
काँपती है पृथ्वी

शांत भाव से समझाती है मेरी माँ -
थक गया है बैल का एक सींग
उसने पृथ्वी को दूसरे सींग पर रखा है

भूकंप से जब कभी होता है
जान-माल का नुकसान
माँ शून्य में देखती, धीरे से बोलती है-
यह सब भगवान की लीला
जब बैल बदलता है पृथ्वी को
एक सींग से दूसरे सींग पर
पृथ्वी के बढ़े पाप झर जाते हैं

सदियों से
पृथ्वी पर बसे हैं हम
पृथ्वी पर सदियों तक बसे रहेंगे

मेरी माँ के विश्वास में-
ईश्वर की संतान हम।

इस देश के करोड़ों लोगों के अनेकों विश्वास
और अनेकों प्रभुत्वशाली अंधविश्वास
कुछ अनायास बने हैं
कुछ को अपनाया गया है सोच-समझ
कुछ का तो धंधा ही जोर पकड़े है अंधविश्वासों के बैनर तले
क्या अंधविश्वास फैलाना- हिस्सा है सत्ता की सोच का!?

निम्नमध्यवर्गीय परिवार की एक लड़की का प्यार

प्यार करती है वह
निम्नमध्यवर्गीय परिवार की एक लड़की
एक जवान गबरू पर
अपना दिल हार गई है

बहुत ही कम पढ़ी-लिखी
निम्न मध्यमवर्गीय की वह लड़की
रात को पानी भर बाल्टी में
उतारना चाहे है भरे पूरे चाँद को

उसके पोर-पोर में
फिल्मी गीतों का आरोह-अवरोह
मन में कृष्ण -राधा की प्रेम-बलियाँ
राम-सीता की आदर्श जोड़ी
शिवलिंग की नित पूजा।

काँटों भरे सरकंडे के घने झुंड में
गौरैया फुर्र-फुर्र
चाव से आस का तिनका चुनती 
घर बनाना है उसे
एक प्यारी सी डाल पर

भीषण गर्मी में उड़ते बालू के बीच
गौरैया द्वारा यह सब कर पाना आसान नहीं
वैसे ही बहुत कठिन है
एक निम्नमध्यवर्गीय लड़की का
प्यार करना भी

पर मेरा कवि मन पुरजोर लगाता है-
गौरैया काँटों के बीच से
अपने को बचाती ले उडे़ तिनका
डाल तक पहुँच जाए बगैर झुलसे
निम्नमध्यवर्गीय लड़की का सफल प्यार
बना ले अपना घर

डाल पर गौरैया का घोसला, झूलता दिखे हमेशा।

‘दुखिया दास कबीर’

वह बहुत दिनों से सोचता आ रहा था
बहुत दिनों तक सोचते रहने के बाद
उसने सोचा एक दिन
वह कुछ भी ऐसा-वैसा नहीं सोचेगा
जो उसे तिलमिला दे

नहीं सोचेगा-
बहन की ठठरी पर चढ़ जाए माँस तो
दुल्हा मिलने में आसानी हो
हर दिन के लिए आग बचाती माँ
झुकी कमर वाली नानी सी दिखती है।

लाला बनी क्षत्रिय मूछों के बारे में
या क्षत्रिय बनी लाला की खिली बांछें-
खदेड़ती घरों को!

आदमी वस्तु है या वस्तु बन गया है आदमी
वस्तु की देह को चमकने की सलाह देती वस्तु

सब तरफ ‘घपला’ शब्द सुनने को आता है
फासिस्ट सोच का कायल उसका पड़ोसी डाक्टर
क्यों हुई उसे इसकी जरूरत!?
संसद की सीढ़ियों पर चढ़ते सांसद की गलीज़ नैतिकता
पिशाचनी-पूँजी के विकराल मूँह में जब्ज इतना बड़ा लोकतंत्र!


बहुत दिनों तक सोचते रहने के बाद
एक दिन उसने बहुत सी उदासी में सोचा
तर्कशील होना बंद कर देगा
तर्कशीलता आदमी को ‘दुखिया दास कबीर’ बना देती है।

तपिश

कहीं सवेरा ढूँढ़ रहा है धूप को
तपती दोपहर मंे छाँव चाहिए कहीं
कहीं सूखा ही सूखा
उसी समय में कहीं डूब गया पूरा गाँव

कुछ जंगल में, तलाश कंद-मूल की .......

और बहुत कुछ बिकने को तैयार है हाट में
दमड़ी की लीला को
न सहलाऊँ अगर
मेरे पिता ही मुझे नकारा कह देंगे

फिर भी बचा के रखना चाहता हूँ-
खोल में तपिश।

एक ताजा वाकया

वह आदमी आगे-आगे चलता था
उसके हाथ में मिनरल वॉटर की बोतल थी
बोतल को खरीदते वक्त
उसने ‘डेट ऑफ मैनुफेक्चरिंग’ को जाँचा था अच्छी तरह

साथ बराबर चलती धर्मपत्नी
पति के लिए ‘पीटर इंग्लैंड’ व बच्चों के लिए
‘वुडलैंड’ का सामान खरीदने के साथ
उसने अपने लिए भी
मशहूर फैशन डिजाइनर के कपड़े पसंद किए थे
खुश थी आज
समान के विभिन्न बंडलों में उसके हाथ बंधे
पीछे चलते बेटा-बेटी
हाथ में उनके लेज़ के वैफ़र

कि एक दुर्बल काया स्त्री
जिसकी आँखों में सूनापन और चेहरा मलीन
दुर्बल काया के हाथ
अगल-बगल में अपने बच्चों को थामने में कसे
हाथों की हथेलियाँ अस्वाभाविक रूप से याचना भाव में
चलना मुश्किल हो रहा था उसका
उस परिवार के सामने आ गई

ऐसी परिस्थितियाँ बनी है पहले भी
कभी दे दिया कुछ
या झिड़क दिया गया
परन्तु इस बार तो उस परिवार ने
हिकारत भरी दृष्टि भी न डाली
उस निर्धन परिवार पर।

और जब वह आदमी अपनी छोटी सी गाड़ी के पास पहुँचा
एक तेज रफ्तार बड़ी गाड़ी आगे निकली 
उस आदमी को पीछे धकेल
बड़ी गाड़ी का ऊँचा बम्पर उस आदमी की आँखों में खटक गया

यह सब बाजार की उस सड़क पर घटा
जिस पर बहुत तड़क-भड़क रहती है आजकल।

चाहत

चाँद उचक-उचक कर नीचे देखता
झांक रहा है महानगर की गलियों में
चाँद की चाहत-
महानगर में कहीं तो पथ-प्रदर्शक बन सके ..........

महानगर महत्वोन्माद से पीड़ित है

महानगर सोचता है-
उसके पास अब साधन बहुत
चाँद की यह इच्छा कि
वह बन सके उसकी किसी गली का पथ-प्रदर्शक
अब किसी काम की नहीं

महानगर अटकल लगा रहा है-
चाँद का किसी तरह प्रत्यक्ष दोहन कर सके
खोजता जीवन के स्रोत चाँद पर
काट रहा है प्लाटस ..... ।

बदलाव

बच्चा टी.वी. से पहचान बनाता-
दिखने में सफेद होता है खरगोश
कछुआ अपनी गर्दन पीठ में छुपा लेता है
शेर जंगल का राजा है
सूंड उठा चिंघाड़ता हाथी

बच्चे की इच्छा में मोगली सा बनना

बच्चा टी.वी. की भाषा में सोच रहा 
सच का अर्थ है ‘हमाम’ साबुन
विज्ञापन की आभा में बच्चा- 
 ‘मैलोड़ी’ खाओ सब जान जाओ’
बच्चे में आजादी का अनुभव
‘पेप्सी' पीकर

‘सुपरमैन’ है ‘बैटमैन है
उड़ता ‘बलू का हवाई जहाज
टॉम व जैरी की छेड़छाड़ 
चहेता ‘मिकी माउस’
बच्चों के सपनों में
कारों के विभिन्न ब्रांड 

दादी माँ के लिए समय नहीं अब
कौन पढ़े शेखचिल्ली के किस्से
पंचतंत्र की कहानियाँ-
गहरे गड्ढे में दफन होती

आसपास कौन से पेड़ लगे हैं
किसी पक्षी की आवाज सुन
उसे पहचानने की चाह नहीं अब।

फुरसत के लिए एक सपना

दुनिया के तमाम तामझाम को बैक-ग्राउंड में धकेल
आज प्रौढ़ होते एक पिता ने
बच्चों से तुड़वाये हैं सफेद बाल

हवा में स्वच्छंद दौड़ता घोड़ा
न जीन कसी है पीठ पर
न ही कोई जकड़ लगाम की

दो बादलों का फोफला होना
एक दूसरे में सिमटना
एक दूसरे को गुदगुदाना

स्निग्ध पंखुड़ियों में सानिध्य-गंध
भूला-बिसरा सरूर परवान.......

यह सब हो गया है निर्दयी समय के विरुद्ध
काम के बोझ का मारा आदमी
‘कहाँ फुरसत है’ जैसे वाक्य को धत्ता दे
आनंद में उमड़ा है

आओ ! इस सपने को बार-बार रिटेक करें।

साफगोई की आशा में

काहे जरूरत थी इतना कुछ बताने की
काहे किए इतने प्रपंची-शोध कि
शीशे के ताबूत में बंद शरीर के मृत होने पर
जब निकलती है आत्मा
ताबूत का शीशा किरक जाता है
‘आत्मा होती है’ का प्रमाण है।

कह देते बस इतना भर
जैसे धूप पार कर जाती है साफ-स्वच्छ शीशे को
वैसे ही आत्मा आर-पार, चमाचम

लेकिन एक अन्य सवाल भी उभरता है

आजकल साफ और स्वच्छ शीशा कहाँ है ?
किसी पर धूल जमी है ........
और रोगन के छींटे जो आ लगे हैं उसे कौन छुड़ाए।

झील व मुनिया की कहानी

वहाँ एक झील थी
छलकता-फलकता आशाओं का सोता
सदइच्छाओं का प्रवाह

पेड़-लता-गुल्म-गात भरपूर आसपास
अपने ही स्टाइल में फलता-फूलता एक जहान

इनके बीच रहती थी मुनिया
इधर-उधर कूदती फांदती
गठ्ठर बनाती सूखी लकड़ों का
जीवन के अधिकतर हिस्से में कंद-मूल का आस्वाद
अपना उत्सव अपना राग।

एक दिन अनष्ट हुआ
‘वो कुछ’ आए झील के पास
पिकनिक मनाया
खाया-पीया
झूठन फेंक दिया सदइच्छाओं के पृष्ठ पर
झील में उनका मल-मूत्र निष्पत

झील की तल में जमने लगी गाद
फैलने लगी सड़न
असमझ में मुनिया।

फिर एक दिन
शुरुआत हुई महाअनष्ट की
‘वो कुछ’ के कुछ ‘वो’ ने
पेड़ लता गुल्म गात को कटवा दिया तेज मशीनी आरी से
समतल करवा दी जमीन
झील के आसपास की मिट्टी को खुदवा
झील के पानी से गुदवाया
साँचे में डलवाया, उनकी मनचाही ईंट बने 

झील के पास बनाई गई एक बड़ी इमारत
अंग्रेजी के दमकते अक्षरों में ‘शॉपिंग प्लाजा’ लिखा 
जहाँ खरीद को पूरे भूमंडल का माल-असबाब 
‘मॉल’ में मुनिया का घुसना मना।

झील अब एक वॉटर-पार्क 
‘एथनिक फन-एन-फूड’ की कंकरीट-दीवार में कैद
मुनिया का कंद-मूल स्पेशल डिश के रूप में सर्व
चटकारे मारते ‘वो कुछ’
‘एनड्यूरिंग मैजिक’ में मग्न

और मुनिया बेघर
इधर-उधर
किधर ?

इंतहा की कुछ टीपें

      1


इस शाही शादी में
वातानुकूलित वाटरप्रूफ शामियाने
आतिशबाजियाँ-रंगबाजियाँ-संगबाजियाँ
फरारी-ऑडी-टोयटा-फोयटा
राजा-रजवाड़ा  मंत्री-संतरी  नेता-अभिनेता
माफिया सट्टेबाज बिल्डर
विदेशी इतर-फितर
प्लेटिनम डायमंड-नेकलेस ब्रांडिड
स्कॉच-कानयॉक शेर्री शैम्पेन
केवियर-झीगा-सालमन  रॉस्टेड अलमंड श्शाही लज़ीज़ा
वगैरह-वगैरह

मैं यहाँ एक और बात का जिक्र करना चाहूँगा
दुल्हन की एक जूती की कीमत इतनी है कि
भारत देश के सौ गरीब
जीवन-भर के लिए
अपने खान-पान का जुगाड़ कर लें

       2


बात वही तक रुक जाती कि
वह अन्याय का प्रतिरोध करने में चूकने लगे हैं
निष्क्रियता का लिबादा पहन बैठ गए हैं
परन्तु हुआ कुछ ऐसा, वो
बच्चियों को गर्भ में ही मारने के इंतजाम में शामिल हो गए।

       3


वैसा ही चेहरा
वैसा ही अट्टहास
वैसे ही छदम् सत्ता के लिए
कर रहे कर्मकांड वैसे ही

सदियों से बिगड़ी अपनी सूरत से परेशां हो
ठीक ही निकले थे तिकड़मी ताकत के विरुद्ध
पर उसी ताकत का नया करार बन गए

चारण भी प्रस्तुत है उनके लिए।


प्रस्तुति-यशवन्त माथुर

Tuesday, 3 July 2012

सिराज फ़ैसल ख़ान की गज़लें



सिराज़  फैसल खान : 10 जुलाई 1991 को  शाहजहाँपुर(उप्र) के एक  गाँव महानंदपुर मेँ जन्म। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के प्राथमिक स्कूल मेँ और उसके बाद इन्टरमीडिएट तक शाहजहाँपुर के इस्लामियाँ इन्टर कॉलेज मेँ पढ़ाई की।  गाँधी फैज़ ए आम डिग्री कॉलेज शाहजहाँपुर से  बी एस सी बायोलॉजी। कुछ वेब पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित ! कविताकोश नवलेखन पुरस्कार 2011 द्वारा सम्मानित!  


सिराज फैसल खान की उम्र को देखते हुए जब उन्हें पढ़ती हूँ तो हैरत होती है, उनकी गजलों में उनके द्वारा उठाये गए  सवाल, सोच और उनका दायरा ये यकीन दिलाता है कि उनमें एक बेहतरीन रचनाकार छुपा है!  वक़्त के साथ उनकी कलम की धार और पैनी हो रही है!  आईये उनकी कुछ गज़लें पढ़ते हैं!



Siraj Faisal Khan


गजल -1 


हमारे मुल्क़ की  सड़कोँ  पे  ये  मन्ज़र निकलते हैँ
सियासी शक्ल मेँ अब मौत के लश्कर निकलते हैँ!


मेरे दुश्मन तो हँसकर फेँकते हैँ फूल अब मुझ पर
मगर कुछ  दोस्तोँ की  ज़ेब से पत्थर  निकलते हैँ!


चली  हैँ  कौन  सी जाने हवायेँ  अब  के  गुलशन मेँ
यहाँ शाख़ोँ पे अब कलियाँ नहीँ ख़न्जर निकलते हैँ!


हमेँ  मालूम  है अब  उस  दरीचे  मेँ  नहीँ  है  तू
मगर फिर भी तेरे कूचे से हम अक्सर निकलते हैँ!


मसीहा ठीक कर सकता है तू ऊपर के ज़ख़्मोँ को
कई  फोड़े  भी  हैँ  जो  रुह  के  अन्दर निकलते हैँ!


हमारे सामने कल तक जिन्हेँ चलना न आता था
हमारे  सामने  ही  आज  उनके  पर  निकलते  हैँ!


खबर पहुँची है मेरी मुफ़लिसी की जब से कानोँ मेँ
मेरे  हमदर्द  सब मुझसे बहुत  बचकर निकलते हैँ!


हमेँ  अच्छा-बुरा  यारोँ   यही   दुनियाँ बनाती  है
दरिन्दे कोख से माँ की कहीँ बनकर निकलते हैँ!


ज़ुबाँ मेँ  शहद  है जिनकी  बदन  हैँ  फूल के जैसे
परख कर देखिये तो दिल से सब पत्थर निकलते हैँ!


गज़ल-2 


घोटाले  करने  की  शायद  दिल्ली  को बीमारी है
रपट लिखाने मत जाना तुम ये धंधा सरकारी है!


बीच खड़े होकर  लाशोँ  के  इक बच्चे  ने ये पूछा
मज़हब किसको कहते हैँ, ये क्या कोई बीमारी है!


तुमको  पत्थर  मारेँगे सब  रुसवा तुम  हो जाओगे
मुझसे मिलने मत आओ तुम मुझ पर फ़तवा जारी है!


हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई आपस मेँ सब भाई हैँ
इस चक्कर  मेँ  मत  पड़िएगा ये  दावा अख़बारी है!


नया विधेयक लाओ अब के बूढ़े सब आराम करेँ
देश युवाओँ को दे दो अब नये ख़ून की वारी है


जीना है तो झूठ भी बोलो घुमा फिरा कर बात करो
केवल  सच्ची  बातेँ करना  बहुत  बड़ी  बीमारी है!


सारी  दुनियाँ  ही  तेरी है,  तू  सबका रखवाला है
मुस्लिम का अल्लाह भी तू है, हिन्दू का गिरिधारी है!

गज़ल-3 


मुल्क़ को तक़सीम कर के क्या मिला है
अब भी जारी नफ़रतोँ का सिलसिला है!


क्योँ झगड़ते हैँ सियासी चाल पर हम
मुझको हर हिन्दोस्तानी  से  गिला  है!


दी  है  क़ुर्बानी  शहीदोँ  ने  हमारे
मुल्क़ तोहफ़े मेँ हमेँ थोड़ी मिला है!


हुक्मरानोँ  ने  चली  है  चाल  ऐसी
आम लोगोँ के दिलोँ मेँ फ़ासिला है!


अब नज़र आता नहीँ कोई मुहाफ़िज़
हाँ, लुटेरोँ का मगर इक क़ाफ़िला है!


लुट रहा है मुल्क़ अब अपनोँ के हाथोँ
सोचिए आज़ाद होकर क्या मिला है!


प्रस्तुति-अंजू शर्मा 

सहयोग : यशवंत माथुर 

Friday, 8 June 2012

अनुपमा पाठक की अनूदित रचनाएँ

अनुवाद कार्य अपने आप मे बहुत कठिन कार्य है और यह कठिनाई तब और बढ़ जाती है जब अनुवादक किसी विदेशी भाषा की रचना को अपनी मातृ भाषा मे रूपांतरित कर प्रस्तुत करना चाहता हो;क्योंकि अनुवादित रचना यदि अंश मात्र भी मूल रचना की भावना को अभिव्यक्त न कर पाई तो अनुवादक की सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है।

मूल रूप से जमशेदपुर से संबंध रखने वाली तथा वर्तमान मे स्वीडन प्रवास कर रहीं अनुपमा पाठक  (जिनके नाम से हिन्दी ब्लॉग जगत मे शायद ही कोई अपरिचित होगा  ) अनुवाद के इस कार्य को ब-खूबी अंजाम दे रही हैं  और वर्तमान मे स्वीडिश भाषा की कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं को हिन्दी भाषा तथा देव नागरी मे सफलता पूर्वक रूपांतरित कर रही हैं।  उनके अनुवाद में न केवल मूल भाषा की आत्मा को जीवंत पाया जाता है  अपितु कविता से उनका जुडाव सहज ही निखर कर सामने आता है!



(अनुपमा पाठक  )


'उड़ान अन्तर्मन की ' के आज के अंक मे हम ले कर आए हैं अनुपमा जी की कुछ चर्चित अनूदित रचनाएँ।


1)  टॉमस ट्रांस्त्रोमर की एक कविता


”दो सत्य”


दो सत्य
एक दूसरे के पास आते हैं
एक आता है भीतर से
एक आता है बाहर से
और जहां मिलते हैं दोनों, वहीँ है इंसान के पास
एक मौका स्वयं को देख पाने का.

2) वोल्फ स्च्रन्क्ल की एक कविता


“यात्री के उद्देश्य”


मैं जीता हूँ
हमेशा एक यात्रा पर गायब रहने के लिए

सुबहें कभी भी एक ही स्थान पर
मुझे हर रोज़ अचंभित नहीं कर सकती

मैं ऐसा किसी विशेष कारण
के तहत नहीं करता

हो सकता है मैं जन्मा ही होऊं
यात्री के जूतों के साथ
या शायद हूँ
थोड़ा सा पागल

या फिर केवल इतना ही कि चाहता हूँ
कॉफ़ी से
सदा अलग अलग सुगंध आती रहे.

3) गुन्नर इकेलोफ़ की एक कविता


”हर एक इंसान अपने आप में एक दुनिया है”


हर एक इंसान अपने आप में एक दुनिया है, जीवों से भरा हुआ
जो हैं अंधे विद्रोह में
अपने आप के ही खिलाफ जो राजा सम राज करता है उन पर.
हर आत्मा में एक हजार आत्माएं बंदी हैं,
प्रत्येक दुनिया में एक हजार और दुनिया है छिपी हुई
और ये अंधी, ये छिपी हुई दुनिया
असल है और जीवंत है, हालांकि अपरिपक्व है,
उतनी ही सच्ची जितना कि सच्चा मेरा अस्तित्व है. और हम राजा लोग
और हमारे भीतर उपस्थित हज़ार संभावित राजकुमार
स्वयं ही विषयों के दास हैं, स्वयं ही बंदी हैं
किसी दिव्य आकृति में, जिसके अस्तित्व और स्वरुप को
उसी रूप में लेते हैं हम जैसे हमारे वरिष्ठ लेते हैं
अपने वरिष्ठों को. उनकी मृत्यु और उनके प्रेम से
हमारी अपनी भावनाओं ने पाया है एक रंग.

जैसे कि जब एक बेहद शक्तिशाली स्टीमर गुज़रता है
सुदूर, क्षितिज पर, वहाँ होती है
बेहद चमकीली शाम. -और हम नहीं जानते कि
जबतक एक लहर पहुँचती है समुद्री तट पर हम तक,
पहले एक, फिर एक और फिर अनगिनत
करती है शोर और धड़कती है तब तक जबतक कि सबकुछ नहीं हो जाता
पूर्ववत. -सब कुछ फिर भी अलग ही होता है.

फिर हम एक विलक्षण चिंता कि छाया में होते है
जब कुछ संकेत हमें बताते हैं कि लोग यात्रा कर चुके हैं,
कि उनमें से कुछ को संभावित मुक्ति मिल चुकी है.


4) वर्नर वोन हेइदेन्स्तम की एक कविता


“लम्बी पैदल यात्रा”


मैं वापस चलता हूँ उस पुल पर, जो ले जा रही है
पृथ्वी से दूर अपरिचित की ओर
और स्वयं दूरी बन जाता हूँ मैं जो पहले कभी था.
वहां नीचे हो रही है आलोचना और चल रहा है विरोध
और तीर चल रहे हैं युद्ध की परंपरा के अंतर्गत,
लेकिन जहाँ मैं जा रहा हूँ, वहाँ देखता हूँ, कि सही और सम्माननीय
मेरे दुश्मनों के कवच पर भी अंकित है.
जीवन का स्वर अब मुझे और भ्रमित नहीं कर सकता.
मैं इतना अकेला हूँ जितना कि एक इंसान हो सकता है,
लेकिन स्पष्ट है अंतरिक्ष, ऊँचा और स्थिर,
और मैं स्वयं को भूल चुका हूँ और स्वतंत्र विचर रहा हूँ.
मैं अपने जूते ठीक करता हूँ और छड़ी फेंक देता हूँ.
मैं चुपचाप वहाँ जाऊँगा, और धूल धुंधला न कर सकेगी
उस दुनिया को, जहाँ सबकुछ शुद्ध श्वेत है बर्फ़ की तरह.
वहाँ नीचे वे ढ़ोते हैं एक बार कब्र तक
एक दीन इंसानी मिट्टी और बुदबुदाते हैं
एक नाम - वह नाम, जो कभी मेरा था.


5)हेनरी पर्लैंड की एक कविता


”ईश्वर की पहली कृति”


ईश्वर की पहली कृति
शून्य है.
आसमान ने धारण कर रखा है उसे,
सितारे भी वही हो जाने वाले हैं.
वह स्वयं भी वहीँ स्थित है.

उसकी अंतिम कृति
लौ है,
जो सब चीजों में छलती है.
क़यामत वाले दिन
इसकी चमक
जीवन को भस्म कर डालती है,
जो एक भड़कदार नक़ाब की तरह
छिपा लेता है
ईश्वर की पहली कृति को.

6) विल्हेल्म इकेलुन्द की एक कविता



"हे कविता!"



हे कविता!
वो हिम्मत नहीं करेगा
आने की तेरे निकट,
जिसकी आत्मा में निहित नहीं हैं
सपने,
सपने देखने की पर्याप्त उर्जा
सपने सजाने की हिम्मत -
शब्द!
शब्द का पुनर्जन्म.

है जिनके गर्जन में-: "यथार्थ अज्ञात है!"
हर उस बात के लिए जिसमें सांस लेती है आस्था,
वास्तविक जीवन का उत्साह;
हैं वो शब्दों को खड़खड़ाने वाले,
उनकी आत्मा ने कभी नहीं चखी
स्वप्न की मदिरा,
शब्द का रक्त.

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प्रस्तुति-यशवन्त माथुर,
सहयोग-अंजू शर्मा