Tuesday, 29 May 2012

अभिषेक ठाकुर की कवितायेँ


         



आज हम आपको मिलवा रहे हैं युवा कवि अभिषेक ठाकुर से, मूलतः बरेली के रहने वाले अभिषेक भूगोल विषय में परास्नातक हैं! स्वतंत्र लेखन करते हैं!  उनका कहना है....

"मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है, 
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है....."

- आईये पढ़ते हैं अभिषेक की कुछ प्रेम-कवितायेँ  -

≈≈≈≈≈≈≈≈
(1)
≈≈≈≈≈≈≈≈

कुछ क्षण चुरा लिए हैं
मैंने अपनी जिंदगी से
पर सिलसिलेवार नहीं रख पाया हूँ
तुम्हें
पहेली की टुकड़ों की तरह
... बंट गया है
तुम्हारा चेहरा उन क्षणों में
तुमसे प्यार पहले हो गया था
और तुम्हारा मिलना
छूट चुका है
कहीं पीछे
अभी तलाश में हूँ
उन क्षणों के
मेरे मोहल्ले के बूढ़े पीपल की तरह
गुजर जाने से इंकार कर चुके है
वो क्षण
रोज नयी यादों
को जन्म दे रहे हैं

≈≈≈≈≈≈≈≈
(2)
≈≈≈≈≈≈≈≈

हमारे गांवों के बीच
बहती नदी का पुल
इस बार बाढ़
बहा नहीं पाई थी
किनारे पर लगे
... ताड़ के पेड़
अब भी इंतजार में
तुम्हारे स्पर्श के
नदी ने छुपा लिया है
हम दोनों का नाम
जो लिखा था तुमने यूँ ही
उस पेड़ को काट दिया गया है
बैरकों के वास्ते
जो हम दोनों ने मिल कर लगाया था
वो नदी जिसने हमें बड़े होते देखा था
मिट गयी हैं कहीं
और हम दोनों के बीच
आ खड़े हुए हैं दो राष्ट्र

≈≈≈≈≈≈≈≈
(3)
≈≈≈≈≈≈≈≈

परिधि  

तुम्हें आगोश में समेटकर
अक्सर ही आ जाता है
ख्याल
समय को बांधने और रोक देने को
कोशिश की है बस इस पल में
जी लेने की तुम्हारे साथ
पर तुम में उतर नही पाता कभी
परिधि को छू कर लौट आने की
प्रक्रिया
तुम होती जाती हो मंथर और शांत
बाँट दिया गया है दिन और रात को
बस संध्या के कुछ क्षणों की खातिर
अनंत प्रतीक्षा को स्वीकार कर लिया है दोनों ने
सूरज की तरह अकेले जलने की पीड़ा भोगता मैं
हैरान हो जाता हूँ
जब मेरे ही ताप को ज़ज्ब करके
बरसाया करती हो तुम उन्हें चांदनी रातों मैं
स्वाति की गिरती बूंदों को समेत लेनो दो सीपियो को ही
मुक्त हो जाने दो उन्हें भी
समेटना मत
इस से पहले कि कीमत तय हो मोतियों कि
खो जाने देना उन्हें सागर में
और भावनाओं के पर्वत से उतरते हम
डूब जाएं उन सीपियों के साथ
शिखर से उलट
जहाँ सिर्फ एक के खड़े होने कि जगह हो
हम दोनों बना सकें मिलन कि तस्वीर
सिर्फ हम दोनों के रंगों के साथ
जहाँ अलग अलग होना सिर्फ अपूर्णता हो
और एक होना बना सके एक नयी यात्रा का पथ
और मेरा हाथ थामना
नीली लकीरें न खींच पाए
तुम्हारे हाथों पर

≈≈≈≈≈≈≈≈
(4)
≈≈≈≈≈≈≈≈

तुमको पाने और
खो देने की संभावनाओं के बीच
तुम और मैं
खो गए हैं कहीं
रोज गढ़ लिया करते हैं
... कुछ नए स्वप्न
यकीन दिलाया करते हैं
खुद को
आगत भविष्य का
जहाँ स्याह रंग की जरुरत न हो
वक़्त की थपकियाँ
सुलाती नहीं
जगा देती हैं अब तो
सूरज बात नहीं करता
बस झांक लिया करता है
रोशनदान के सीखचों से
तुम्हें पाने और
खुद को खो देने की संभावनाओ के बीच
कैक्टस फिर से कहीं बड़ा न हो जाये

≈≈≈≈≈≈≈≈
(5)
≈≈≈≈≈≈≈≈

असंख्य रातों के जागरण के बाद
बच जाएगी
आँखों में तीरती नींद
और छत पर जाल बुनती
एक मकड़ी
कुछ अधूरे उपहार
जिन्हें जला दिया जाएगा या
फेंक दिया जाएगा घर के
टूटे सामान के साथ
और ख़त बच जायेंगे
शायद
कुछ मार्के की ग़ज़ल
लिखने को
या गर्मी की एक दोपहर को
हलकी बौछार की तरह
खुद को भिगो देने के लिए
या एक बिना रील के कैमरे
से ली गयी कुछ अकेली तसवीरें
और अंत में बच जाएगा
सिर्फ एक मौन
टेबल लैम्प की
आवाज की तरह
और एक
जूठी चाय की प्याली
 
≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈
              प्रस्तुति : अंजू शर्मा
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Monday, 7 May 2012

अहर्निश सागर की कविताएं...



आज हम आपको मिलवा रहे हैं युवा कवि अहर्निश सागर से! राजस्थान के रहने वाले अहर्निश की कवितायेँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं! अभी हाल में ही जिन युवा कवियों ने ध्यानाकर्षित किया है अहर्निश का नाम उनमें प्रमुखता से उभर कर आता है!


परिचय  -
M L S U विश्वविद्यालय  उदयपुर से BA एवं श्री गंगा नगर से C.M.S & E.D.P की उपाधि रखने वाले अहर्निश सागर की रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रहती हैं।  
इनकी कविताओं मे व्यावहारिकता का तत्व आपको कविता के साथ उसका हिस्सा बन कर चलने को प्रेरित करेगा। लेखन का यही मंतव्य होता भी है और लेखन की सार्थकता इसी मे है यदि आम पाठक उससे थोड़ा भी खुद को जुड़ा महसूस करे।

तो आइये चलते हैं इनकी कविताओं की ओर--


(1)


मेरा अस्तित्व दौड़ता हैं
महानगर के फुटपाथ पर
साइकिल लिए मजदूर के उनमान
मैं अनदेखा करता हूँ
गुलमोहर के फूल
मैं अनसुनी करता हूँ
नीलगिरी के पेड़ों से
गुजरती हवा की बौखलाहट
भुला देता हूँ , हर बार
मेरे गुरुर भरे गाल पर पड़ी
डूबते सूरज की थाप
तेरे सपनों की
विषाक्त मवाद सने तलवे
घसीटते हुये जाता हूँ
वासनाओं और तृष्णाओं के
कारखानों की तरफ
तेरी कपोल कल्पनायें
भुला देती हैं मुझे
मेरी हथेलियों के नासूर
और लोहे को जला देता हूँ
उसके पिघलने की हद तक
और तामीर करता हूँ
कुछ सलाखें तेरे इर्द-गिर्द
ताकि तेरे स्वप्न बचे रहे
सत्य के नाखूनों से
इस स्व-विध्वंस में छिपा
मेरा प्रेम हैं कोई साजिश नहीं
तुम पहचान सकोगे, मुमकिन नहीं
फिर भी
मेरे वजूद का अंतिम कतरा तक
लड़ता रहेगा
मैं हार कर भी हारूंगा नहीं
मैं टूट कर भी टूट नहीं सकता
मेरा सर्वस्व शापित हैं
पुरुष होने के लिए .........//



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(2)

बेवजह आ गयी हो छत पर
देख रही हो
दो कपोतों के प्रेमालाप
इस सत्य से बेखबर
समूचा अस्तित्व
साँस लेने लगा है तेरी पुतलियों में
भादो के घन थाह लेकर
रूक गयें हैं तेरी पलकों पर
कोपलें निकल आई हैं
बुड्ढे दरख्तों पर
चिड़ियों के कंठ
गीतों के आवेश से फटने को आतुर

अनहद के रंग-मंच पर
ये कौन सा किरदार तुम निभाती हो ...?

अभी पुकारेगी एक बूढी आवाज़
और सरपट उतर जाओगी सीढियों से

छोड़कर..
आकाश को निरा
बादलों को बेसहारा
अस्तित्व को अधूरा
ये नभ-चर भटक जायेंगे अपना पथ

पुनः शुरू होगी
मेरी अंतहीन तलाश
तुम फिर हो जाओगी अग्गेय
प्रेम के मानिंद............//

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(3)

वो अनाम लड़की
बरसों पहले गयी थी
एक गाँव से ब्याह के
दक्षिण के किसी शहर में
उसे आज भी याद हैं
बचपन की वो सुबह
जब उसके बाबा ने दिये थे
नीले फीतों वाले जूते
और उसकी किलकारियों से
टूट गयी थी , घोसले में
गौरेया के बच्चों की नींद
उस रोज़ ......वो लड़की
चहकती , फुदकती
गिलहरी हो आई थी
नाप आना चाहती थी
पग-पग सारी धरती .../

आज भी वो लड़की
ब्याह की हर सालगिरी पर
टटोलती हैं , सहेलियों के तोहफे
उसमें होते हैं ...
शीशे के दिल
चीनी मिट्टी के ताजमहल
नकली खुशबू वाले गुलदस्ते
तीखी लाल रौशनी वाले लैम्प
पर उसे नहीं मिले कभी
वो...नीले फीतों वाले जूते /
कोई नहीं जानता
क्यों वो लड़की
उबलती चाय छोड़कर
आ जाती हैं, उच़क कर बालकनी में
और कमर के बल झुककर
ढूँढती हैं , गली में खेलते बच्चों के पैरो में
नीले फीतों वाले जूते...
और सहसा अतीत का आसमान
पिघल कर टपकता हैं पलकों से
नहीं, कोई नहीं जान पाया
क्यों वो अनाम लड़की
बार बार लौटना चाहती हैं
इतिहास के खंडहरों में.

क्यों वो चीख पड़ती हैं
जब कोई उलट देता हैं
मेज पर पड़ी रेतघडी..............//

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(4)

अपने शब्दों से खरीद ली थी
कुछ रोटियां
कुछ ज़ज्बात

वो ज़ज्बात
आंसू बन गिरे थे
मेरे काँधे पर,
कमीज के रेशों में कही खो गए.
वो रोटी
हलक से नीचे ना उतर पायी
कितनी बार ...........बनाया
गले को बहरूपिया
तब जाके वो कौर, निगल पाया.

मान बैठा था खुद को रचयिता
कवि, गज़ब का.

बुजुर्गों ने समझाया भी--
सच्चे कवि लिखते नहीं
रचयिता कुछ रचता नहीं.
उस चिलम फूंकते बुड्ढे ने कहा था--
शब्दों के सूअर, समय कसाई हैं
काट देगा.

मुझे याद हैं
भीड़ से हटके खड़े, उस बच्चे की चीख
तालियों की गूंज में
कही खो गयी थी.
लगातार घूरता जा रहा था
अपनी क्षोभ भरी आँखों से मुझे.
उसने फेंका भी था
अपने ज्वर ग्रस्त हाथो से एक पत्थर
मेरी तरफ.

धन्यभाग, मेरी कुर्सी कुछ ऊँची थी
में बच गया.!

आज सालो बाद
जाने कहा से वो पत्थर लग गया.

अपने एहसासों के कन्धों पर
जा रहा हूँ मरघट तक
जलूँगा आज अपने ही वर्कों में

समय कसाई था, मुझे काट दिया
आज ये बोध हुआ,
में फकत शब्द हूँ , कवि नहीं
क्योंकि ....
कवि कभी मरता नहीं //

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(5)

देहों के लिबास बुन बुन कर
सख्त हो जाएगी
कमल के साख सी अंगुलियाँ
पत्थर - सी
दैहिक वासनाओं के कारण
भर उठेंगे कभी तो
काले खून से तेरे स्तन
धोखा देगा तुझे
अपना ही ममत्व , अपनी ही करुणा /

कभी तो आओगी न तुम
खुद से नफरत करती
अपने अहाते में
चटकी कली चंपा की देखने
कभी जब रह जाओगी अकेली
नीरव दुपहरी में, अपने ही घर में
बरामदे में आकर निहारोगी नीला आकाश
तलोशोगी उसमें तुम,
प्रेम के गहरे अर्थ , खो चूका अतीत

जरा सोचो तो ...
इन-इन पलों में
कौन-सी स्मृतियाँ ताजा होगी
कौन-सा चेहरा याद आएगा ..../

¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤

(6)

"मृत्यु - बोध "

साँसों के रेशे जब खोल रहे होंगे
मेरी देह से बंधी अंतिम गाँठ
मेरा मन पकायेगा मेरी देह के चूल्हे पर
सफ़र का अंतिम कलेवा
और तुम भटकोगी प्रेम की गठरी सिर पर लिए
दो देह लिप्त सभ्तायों के बिच, विवश

उस निमिष अंतिम बार सुनूंगा मैं
इन छप्परों पर से गुजरते
परिंदों के झुण्ड का कलरव
और याद आ जायेगा
एक पिली शाम में उड़ता धानी आँचल
विन्ध्य के बियाबानों में खोती
एक आदिम कमंचे की धुन
तेरे लिए चुराकर लाये मकई के हरे भुट्टे
शायद ही मैं याद कर पाऊं जीवन भर के संग्राम
मेरी असफलतायें
रेत के निरर्थक टीलों पर मेरे अहम् का विजयघोष

तुम देखना ...
अविराम मेरी आँखों में
ताकि सुन सको
हमारे प्रणय का अंतिम गीत
और मैं आत्मसात कर पाऊं
विछोह की छाछ पर मक्खन बन उभर आई तेरी अम्लान छवि
शायद वो अंतिम मंथन होगा हमारे सम्बन्धों का
मेरी संततियों....!
जब तुम रो पड़ोगे
आदतन दांतों से नाख़ून कुतरते हुये
मेरी चारपाई का उपरी पायदान पकड़ कर
तब माफ़ कर देना अपने सर्जक को
उसकी अक्षमता को
शायद इस जीवन की निरंतरता का सत्य...
..........इसके अपूर्ण रह जाने में ही हैं
जैसे वादन के बाद विराम
उच्छ्वास के बाद निःश्वास

तुम्हारी मान्यतायें
मुझे मृत घोषित कर देगी देह की परिधियों पर
और मैं भभक कर जी लूँगा
अपनी मौत........................//


प्रस्तुति --यशवन्त माथुर 

Tuesday, 14 February 2012

ढाई आखर प्रेम के – 3



प्रिय मित्रों,


प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाई |
राजा प्रजा जिस रुचे, सीस देय ले जाई || 

 
संत कबीर ने कहा है कि प्रेम को न तो खेत में उत्पन्न किया जा सकता है और न ही यह बाज़ार में मोल बिकता है, प्रेम में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, स्वत्व को त्याग कर ही प्रेम को पाया जा सकता है!  ऐसे प्रेम को अपने शब्दों के द्वारा बहुत ख़ूबसूरती से चित्रित किया है हमारे कुछ साथियों ने! हम आभारी हैं सभी के, जिन्होंने इतने कम समय में अपनी सुंदर रचनाएँ हम तक पहुंचाई! इस वासंती रुत में हर ओर केवल प्रेम ही प्रेम है! आप भी सुंदर प्रेम कविताओं का आनंद उठाइए !   


हम इस ब्लॉग का तीसरा और अंतिम भाग  ढाई आखर प्रेम के-३  प्रस्तुत कर रहें हैं,  इस उम्मीद के साथ कि प्रेम के इस रंग में आप भी सराबोर हो जायेंगे ....................


इस भाग में जिन कवियों की कवितायेँ प्राप्ति के आधार पर सम्मिलित की गयी हैं उनके नाम इस प्रकार हैं......


१.  अमितेष जैन
२.  अर्चना राज
३.  खुशबू सिंह
४. सुशील कृष्णेत
५. उमेश कुमार तिवारी
६.  रश्मि प्रिया
७.  नीरज पाल
८.   रेखा चमोली
९.   रजनी नैय्यर मल्होत्रा
१०.  नारायण सिंह चौहान
११.  हरीश अरोड़ा
१२.  माझी अनंत
१३.  भारत दोषी 


कृपया अपनी राय और सुझावों से अवगत कराएँ..........

 
udaanantarmanki.blogspot.com
 




अमितेष जैन 
 
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तुम नहीं जानती

 

तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
एक बार 
जब तुम चाय पी रही थीं 
मैंने तुम्हारी एक चुस्की चुरा ली थी
मेरे होंठो पर अब तक उसकी मिठास है 
तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
एक बार 
जब तुम जुल्फें संवार रही थी 
मैंने तुम्हारी जुल्फों को छुआ था
मेरी उँगलियाँ अब तक महकती हैं
तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
एक बार 
जब तुम मेरे पास बैठी थी
मैंने तुम्हारे हाथ की मेहँदी देखी थी 
मेरी दुनिया अब तक रंगीन है 
तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
एक बार 
जब तुमने मुझे पुकारा था
मैंने तुम्हारी आवाज़ सजा ली थी
मेरे चारों ओर अब भी गीत बजते हैं 
तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
एक बार 
जब तुम मेरे साथ चल रही थी 
मैं तुम्हे चाहने लगा था
और अब तक तुम्हारे इंतज़ार में चल रहा हूँ 
तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
मैन तुम्हारी आवाज सजा ली थी... ... ......
तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
और मैं अब तक तुम्हारे इंतज़ार में चल रहा हूँ
तुम नहीं जानती हो........
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  
मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं ...  

 
   




अर्चना राज

 
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प्रेम बनाम अस्तित्व


लहरों ने एक दिन पूछा  किनारे से
की तुम कैसे रह पाते हो
इतना स्थिर, इतने शांत
बिना किसी हलचल, किसी गति के ,
किनारा हौले से मुस्कुराया
उसकी आँखों में अहिस्ता से उतर आई नमी
अचानक खुश्क हो गयी ,
कहा उसने की यही तो मेरी नियति है
ख्वाहिश नहीं मेरी मजबूरी है ..सदियों से
बस एक जगह स्थिर रहना;
मै टकटकी लगाकर
मात्र देख सकता हूँ .. महसूस कर सकता हूँ
पर कुछ भी क्रियात्मक नहीं कर सकता ,
सूरज जब अपनी सारी तीखी तपिश के साथ
मुझ पर छा जाता है
और मै अग्नि सा जलने लगता हूँ
तो बेतरह चीखता-चिल्लाता हूँ ..पर बेआवाज़
जिसे कोई नहीं सुन पाटा सिवाय तुम्हारे ;
तुम ही हो जो दौड़ी चली आती हो
अपनी ढेर सी नमी और ठंडक लेकर ;
और मुझमे ऐसे ज़ज्ब हो जाती हो
की मै फिर से स्वाभाविकता से जी पाता हूँ ,
जब भी हवाएं उग्र होती हैं
तो उड़ा ले जाती हैं मुझे ..यहाँ से वहां ;
जब मै बिखरने लगता हूँ ..बुरी तरह ..विवशता से;
तब भी बस तुम्ही हो
जो संभाल लेती हो मुझे अन्दर ही अन्दर ;
मुझे सांत्वना देती हो और अनजाने ही
जोड़ देती हो मेरे रक्त कड़ों को वापस मुझमे ,
और ये बारिश भी
जब होती है अपने पूरे यौवन पर ;
तब अपने जिंदादिल रफ़्तार से
मुझे यहाँ से वहां बहा देतीहै ;
मै भी जार- जार रोता हूँ
उसकी निरंतर गिरती बूंदों के संग ;
पर बादलों की गर्जना
और बिजली की कड़कडाहट में
कोई भी मेरी चीत्कार नहीं सुन पाता
सिवाय तुम्हारे ;
मेरे ढेरों अंग - प्रत्यंग न जाने कहाँ खो जाते हैं ;
तब भी ऐ लहरों ..तुम ही हो
जो न जाने कहाँ -कहाँ से उन्हें
ढूंढकर लाती हो और जोड़ देती हो मुस्कुराते हुए
बेहद खूबसूरती से ..बिना कोई निशाँ छोड़े ,
क्यों करती हो तुम ऐसा ..कहो तो
क्या है मेरा और तुम्हारा
ये अनकहा और बेनाम रिश्ता ,
पल भर के लिए लहरें थम गयी ख़ामोशी से
पर जब बोलीं तो उनकी आवाज़
आंतरिक रुदन के चरमोत्कर्ष से फट पड़ी ,
कौन हूँ मै तुम्हारी और क्यों करती हूँ ये सब
मै नहीं जानती
पर तुम्हारे बगैर जीना भी तो नहीं जानती ;
मेरे अस्तित्व की पहचान भी तुम्ही से है
वर्ना इस विशाल सृष्टि के महासागर में
मै भी न जाने कहाँ खो जाती ,
तुमसे दूर ..बेहद विकल और अधूरी सी होती हूँ ;
एक विचलित अहसास मुझमे
हलचल पैदा करता रहता है निरंतर ;
जिससे घबराकर मै बार-बार.. लगातार
तुम्हारे पास दौड़ी चली आती हूँ ;
तुम्हारे पास आकर ही मेरी बेचैनी को
कुछ ठहराव मिलता है;
तुम्हारे आगोश में कुछ पल के लिए ही सही
पर पूर्ण होने का अहसास  होता है,
पर न तो तुम्हारी सामर्थ्य इतनी है की
तुम मुझे रोक सको
और न ही मेरी की मै रुक सकूं ;
तुम्हारी प्रकृति है --बेहद स्थिर
और मेरी -- निरंतर गतिमान;
हम दोनों ही बिलकुल विपरीत हैं
पर एक दुसरे के बिना अपूर्ण भी ;
इसीलिए मै बार -बार तुम तक आती रहूंगी
अपनी परिपूर्णता के लिए
और तुम बार-बार नम होते रहोगे
अपने अस्तित्व के लिए ;
और यही हम दोनों के लिए
निर्धारित सुख भी है और श्राप भी;
अनंतकाल से न जाने कब तक..बस यूँ ही !!






ख़ुश्बू सिंह



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मैं खुश हूँ ....




ये आकाश मेरा हैं
इसका आदि और अंत सब मेरा हैं
मैं जंहा चाहू घूम सकती हूँ
जंहा चाहू देख सकती हूँ
मगर न तो ये आकाश


कभी उतर कर मेरे पास आयेगा



और न ही मेरे पंख हैं
जो उस तक पहुँच सकू
मैं यंही हूँ खुश हूँ
आकाश मेरा हैं
इसकी गर्जन, फुहार
बसंत बहार
सब पर मेरा हक़ हैं
मैं अपना हक़ ले रही हूँ
वो मुझे मेरा हक़ दे रहा हैं
मगर आज भी अब भी
मैं खामोश ही हूँ जैसे पहले थी
क्यों की जानती हूँ
आकाश का एहसास ही मेरा हैं
मैं तो इसे छू भी नहीं सकती
नजर भर देख लू बेशक
मगर झलक उसकी दिखा
भी नही सकती.....










सुशील कृष्णेत



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तुम्हारा होना उतना नहीं होता
जितना तुम्हारा न होना ,
जब घर में होती हो तब एक बारगी ;

एक जगह होती हो...
किचेन में गोल-गोल रोटियाँ सेंकते,
कलाई में गोल-गोल चूड़ियाँ खनकाते,
मुन्ने की ठुड्ढी पकड़ बाल संवारते
और कभी-कभी गृह-मंत्रालय का बजट समझाते॥
ऐसे ही कई फ्रेमों में बंटी-छंटी-थकी और ....पस्त !

पर आज जब नहीं हो
तो एक साथ सब जगह हो घर में
सर्वव्यापी।
दरवाजे की उस पहली दरार
जो खुलने से पहले दिखाती है तुम्हारी झलक...

से लेकर झाड़ू की मूठ पर पड़े
तुम्हारी उँगलियों के निशान तक ।
कहाँ नहीं हो ?
बिस्तर पर फिंके गीले तौलिये पर

चिपका है तुम्हारा ताना-
"कोई और होती न तब पता चलता ..."
फर्श के पोंछे का वह कपडे का टुकड़ा ,

जो भीगा है तुम्हारे आदेश से-"चप्पलें बाहर..."
आईने पर वो पुरानी बिंदियाँ

जो चिपकीं हैं तुम्हारे सौन्दर्याभिमान के गोंद से-
"अभी भी ऐसी दिखती हूँ कि..."
तकिया फूली है तुम्हारे जिद के फाहे से
जो बन जाती थी हमारे बीच का बाघा बार्डर
शर्ट की कालर से उलझा है

तुम्हारा इक बाल
जो वक्ते-रुखसत की आखिरी निशानी है ।
सच कहूं मेरी परिणीता !
तुम्हारा होना उतना नहीं होता
जितना तुम्हारा न होना ...











उमेश कुमार तिवारी



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प्रिये, 
प्रियेतम ,
सुन्दर, 
सुन्दरतम 
ताल, वाध्य, राग, रागनी 
छंद, मुक्तक, 
नज़्म, गज़ल 
स्वर, व्यंजन 
और गीत 
मीत सभी 
तुम .........











रश्मिप्रिया



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प्यार सिर्फ ढाई आखर का शब्द नहीं
जब होता है

तो हो जाता है रगों में बहता है
लाख छुपाने के बाद भी

आँखों में नज़र आता है
किसी बच्चे की जिद के समान

जुनूं बन कर सताता है
और जब याद आता है
तो बस मुस्कुराहट बन

होठो में सज जाता है ....





 



नीरज पाल





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प्यार की हर सुबह हो 
प्यार की हर शाम हो 
ये जिंदगी हर एक की
बस प्यार के ही नाम हो 
प्यार जब इतना ज़रूरी 
है इस ज़हां में तो 
प्यार करने वाले भला 
क्यों फिर बदनाम हों







रेखा चमोली



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पेड़ बनी स्त्री



एक पेड़ उगा लिया है मैंने
अपने भीतर
तुम्हारे प्रेम का
उसकी शाखाओं को फैला लिया है
रक्तवाहिनियों की तरह
जो मजबूती से थामें रहती हैं मुझे
इस हरे-भरे पेड़ को लिए
डोलती फिरती हूॅ
संसार भर में
इसकी तरलता नमी हरापन
बचाए रखता है मुझमें
आदमी भर होने का अहसास
एक पेड़ की तरह मैं
बन जाती हॅू
छॉव, तृप्ति, दृढता, बसेरा ।







 



रजनी नैय्यर मल्होत्रा 



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प्रेम , प्रेम ही होता है





प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
चंचल मन को मिलन की तिश्नगी,
जीवन को दर्पण देता है|
तन,मन धन सर्वस्व न्योछावर ,
पथरीले राहों में मंजिल को संबल देता है|
दुःख-सुख के पलों में आलिंगन देता है
प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
अदभुत है इस प्रेम की रीत,
त्याग का दूजा  नाम है प्रीत|
जहाँ त्याग नहीं हो प्यार में,
वो प्यार  वफ़ा नहीं देता है |
प्रेम से  सुगन्धित संसार है,
ये फूलोँ में काँटों का हार है|
त्याग,बलिदान,वफ़ा से ,
जुड़ा प्यार का नाता है|
सिर्फ प्रेम को पाना ही नहीं,
लूट जाना भी प्यार है|
संसार से जुड़ा हर रिश्ता प्रेम से गहराता है,
वो प्रेमी,प्रेमिका,भाई ,बहन, दोस्त,पिता - माता है |
प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....









नारायण सिंह चौहान



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बाते  दो चार करे  



बाते  दो चार करे  ,
निगाहों  से  वार  करे ,
दिल  में  है  एक  आश,
कोई  हमे  प्यार  करे
प्यार  का इजहार  करे
जब  कही  जाये  रूठ  ,
दिल  जाये  टूट  टूट  ,
फिर  आये  वो  पास  ,
में  भी  रूठू  ,
झूट  मुठ  चितचोर  जाये  ,
हमको  भी  कोई  लुट  
बाते  दो चार करे  ,.......
शिकवे  शिकायत  हो  ,

रोज  रोज  बाते  हो  ,दे
ख  ले  कोई  काश  !
छुपछुप   मुलाकात हो 
मुह्ब्त्त  की  थोड़ी  सी 
हम   पर  भी  इनायत हो 
बाते  दो चार करे  ,....…..
दिल  ना  रहे  बस  में  ,
तोड़े  सारी रश्मे  ,
जब  तक  चले  साँस  ,
खाते  रहे  कसमे
लहू  में  मिलके  प्यार  ,
दोड़ जाये  नस नस में
बाते  दो चार करे  ,..........








हरीश अरोड़ा 


 
rose3
 




प्रेम 


 
प्रेम में 
बंधन नहीं हैं
तुम उसे एहसास के 
नन्हें सजीले पंख देकर 
मुक्त कर दो 
वह उड़ेगा 
क्षणभर उड़ेगा 
और फिर से लौटकर 
स्नेह के बंधन तुम्हारे चूम लेगा 
देह के लघु-खंड तो 
क्षण की शिला हैं 
छू नहीं सकते 
स्थिर हैं.
वे तुम्हारे 
प्रेम की नवसर्जन में 
गदगद रहेंगे 
मूक अभिनन्दन करेंगे 
मूक अभिनन्दन करेंगे.








माझी अनंत 




heart





नाम



प्रेमीजन छोड़ गए हैं
अपने-अपने नाम
खोदकर पेड़ के तनों
टीन के छप्परों और
दीवाल की अंदरूनी
तहों पर .
यह नाम
सुरक्षित रखेगा
उनके प्रेम को
वे याद आएगें लोंगों को
जब-जब पढ़ेगें इसे.
नहीं हो सकते शीरी-फरहाद
लैला-मजनू या लोरिक चंदा
नहीं बना सकते
कोई ताजमहल
नहीं गढ़ सकते इतिहास .
फिर भी वे करते हैं प्यार
करते रहेंगें इसी तरह
और खोदते रहंेगें नाम .
किसी दिन
वे आएंगें लौटकर
पढ़ेगें अपने नाम
और हरे हो जाएंगे
पुराने दिन










भारत दोषी 



rose





प्रेम –रोग



मेरे हिस्से का आसमान
काले बादलो से घीरा है
शायद बिजलियॉ चमके
गडगडाहट हो
मूसलाधार बरसे
शायद हवा चल जाए
आंधी चले
बादल चल दे तेरे हिस्से ।

तेरे हिस्से के आसमान ने
घनघोर वर्षा की है
सब कुछ बह गया बाढ में
मुझे मालुम है तेरी तरफ से आते
बाढ में
तेरे आंसू भी शामिल है
यह पानी मेरे लिए
पवित्र,निर्मल है
जिसमे मैं डूब भी गया तो गम नहीं ।